हम बच्चों को क्या सिखा रहे हैं

कल मैं सन्न रह गई जब मेरी छह वर्ष की बेटी ने बैरी शब्द से ये वाक्य बनाया:

पाकिस्तान मेरा बैरी है

बैरी

एक मिनट तक तो मैं कुछ कह नहीं पाई | उसके बाद हमारी बातचीत कुछ इस तरह हुई:

मैं – ये तुम्हें किसने कहा कि पाकिस्तान हमारा दुश्मन है?

पाखी – क्यों, टीवी में तो दिखाते हैं न कि पाकिस्तानियों ने हमला कर दिया | हमारे सैनिकों को मार दिया |

मैं (थोडा चुप रह कर) – हाँ, पर सभी पाकिस्तानियों ने तो नहीं किया न? कुछ लोगों के कारण तुम सबको दुश्मन बनाओगी?

फिर तुम तो उनको जानती भी नहीं, तो न वो दोस्त हुए न दुश्मन |

अगर नैना (उसकी दोस्त) से तुम्हारा झगड़ा हो गया तो वो तुम्हारी बैरी हो गई?

पाखी (थोडा सोच कर) – नहीं, नैना तो मेरी दोस्त ही रहेगी, पर उस दिन टीवी पर वो अंकल बोल रहे थे न कि पकिस्तान हमारा दुश्मन है |

उसकी बात ने मुझे निरुत्तर कर दिया | उससे पहले भी जो मैंने कहा था मुझे नहीं मालूम सही उदाहरण था या नहीं, उसे बात समझ आई कि नहीं | पर जो बात मेरे ज़ेहन में बराबर चल रही थी वो यही कि एक देश के तौर पर हम कहाँ जा रहे हैं | हम अपने बच्चों को क्या वातावरण दे रहे हैं |

अगर एक छह साल की बच्ची को हम ये सिखा रहे हैं कि एक पडोसी मुल्क हमारा दुश्मन है, तो क्या हम नकारात्मक सोच वाले नागरिक को तैयार नहीं कर रहे? या ऐसा नागरिक जो अपनी विचारधारा में कहीं न कहीं अतिवादी है?

मुझे तो कम से कम ऐसा ही लगता है.

टीवी पर परिचर्चाएं, या फिर समाचार भी इस तरह से प्रस्तुत किये जाते हैं कि आपको खुल कर सभी पहलुओं पर विचार करने का मौका ही नहीं मिलता | हर न्यूज़ चैनल मुद्दे के किसी एक पहलू को इतने तार्किक तौर पर दिखाता है कि लगता है वही सही है. एक आम नागरिक के रूप में ये तो कहीं न कहीं लगता है कि इनके पास ज्यादा जानकारी होगी |

शायद वो पहलू सही भी हो, पर क्यों न हम स्वयं ये तय करें | क्यों कोई और हमें बतायेगा कि सही क्या है और गलत क्या है, विशेषकर जब वो उसके अधिकारक्षेत्र में नहीं है | क्योंकि जहां तक मैं समझती हूँ, न्यूज़ चैनल का प्रमुख काम हर समाचार को निष्पक्ष तौर पर प्रस्तुत करना है |

पहले समाचार आना चाहिए, उसका विश्लेषण बाद में | वो भी सही वातावरण और उद्देश्य के साथ |

आपका क्या ख़याल है? कमेंट में अवश्य बताएं |

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